कथा में एकाग्रता, साधना व श्रद्धा जरुरी - महामण्डलेश्वर हरिओमदासजी महाराज

कथा में एकाग्रता, साधना व श्रद्धा जरुरी - महामण्डलेश्वर हरिओमदासजी महाराज

द्वितीय दिवस -
तपोभूमि लालीवाव मठ में गुरुपूर्णिमा महामहोत्सव के तहत चल रही श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस में आशीर्वचन के रुप मे कहा कि वक्ता में 32 लक्षण होने जरुरी है । एक भागवत वक्ता में सभी भगवान स्वरुप दिखाई देना चाहिए । उन्होंने कहा जीवन के लक्ष्य को पाना बड़ा ही कठिन है । कथा के लिए एकाग्रता, साधना और श्रद्धा बेहद जरुरी है । लोक कल्याण के लिए अगर कोई व्यक्ति सेवा कर रहा हैं तो वह सत्कर्म भगवान की कृपा से ही संभव है । भगवान के नाम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान का नाम बंधन से मुक्त करता है । नाम का वर्णन करते हुए कहा कि दिल में स्मरण करने वाले लोगों का कल्याण भगवान अवश्य करते है । अगर भगवान की पूजा अर्चना करने का समय नहीं है तो सिर्फ भगवान का स्मरण कर भगवन नाम का जाप करते रहे इसी से भगवान प्रसन्न होते है ।
इसके पश्चात् भागवतजी की आरती भागवत भगवान की है आरती पापियों को पाप से है तारती और ओम जय शिव ओमकारा उतारी गई । उसके पश्चात प्रसाद वितरण किया गया । संचालन शिक्षाविद् शांतिलालजी भावसार द्वारा किया गया ।
शहर के ऐतिहासिक तपोभूमिलालीवाव मठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव के तहत प.पू. महामण्डलेश्वर हरिओमदासजी महाराज के सानिध्य में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन बुधवार को पहले व्यासपीठ का पूजन ओर आरती हुई । श्रीमद् भागवत भगवान की आरती पापियों को पाप से है तारती.... । जैसे ही यह आरती शुरु हुई पण्डाल में उपस्थित श्रद्धालु अपने अपने स्थान पर खड़े होकर गाने लगे । कथा के आंरभ मेंमहेश राणा, सुभाष अग्रवाल, डॉ. विश्वास बंगाली, सियारामदासजी, दीपक तेली, श्रीमती जोगेश्वरी भट्ट, आदि द्वारा व्यासपीठ पर माल्यार्पण किया गया । इसके बाद बाल व्यास पण्डित अनिल कृष्णजी महाराज ने जोर से बोलना पड़ेगा.... राधे-राधे.... दूसरे दिन कथा शुरु की ।
असार और झूठे संसार का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु - पंडित अनिलकृष्ण
शहर के ऐतिहासिक तपोभूमि लालीवाव मठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव के तहत प.पू. महामण्डलेश्वर हरिओमदासजी महाराज के सानिध्य में चल रही श्रीमद भागवत कथा में भागवत प्रवक्ता बालव्यास पण्डित अनिलकृष्णजी महाराज ने कहा कि वाणी और क्रोध पर संयम रखना चाहिए । राजा परिक्षित ने कलियुग के प्रभाववश संत का अपमान कर दिया जिसके फलस्वरुप उन्हें सात दिनों में मृत्यु का श्राप मिला । उन्होंने कहा यह संसार सबसे बड़ा झूठा है और इसका सबसे बड़ा सत्य मृत्यु है । प्रत्येक जीव को मरना है लेकिन मोह का बंधन इस सत्य को मानने से बचता है । उन्होंने कहा समय के साथ वृद्ध होता शरीर मृत्यु निकट आने के कई संकेत देने लगता है लेकिन मानव इन संकेतों को भी नहीं समझता और सांसारिक माया में फंसा रहता है । बच्चों को धर्म, संस्कारों की शिक्षा देने की बात कहते हुए कहा कि आजकल माता-पिता अपने बच्चों को केवल खाना, कमाना सिखाते हैं । वे बच्चों को धर्म और भगवान से दूर रखते हैं, उनकी जिम्मेदारियों से दूर रखते है । जो कि गलत है । ऐसा नहीं होना चाहिए ।
बच्चों को शिक्षा व अच्छा संस्कार दें - पं. अनिलकृष्ण
अनिलकृष्णजी ने कहा कि हमें अपने बच्चों को संस्कार और अच्छी शिक्षा अवश्य देना चाहिए । बच्चे शिक्षा तो प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन संस्कार भूल रहे हैं । संस्कारवान नई पीढ़ी ही अपने जीवन को सफल और सार्थक कर सकती है । लोक कल्याण ही परम धर्म है । इससे जीवन आनंदित होता है । सभी को आनंदित करना ही सच्चा धर्म है ।
भागवत सुनने से सात दिनों में मोक्ष की प्राप्ति- पंडित अनिलकृष्ण
भागवत का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करने से मात्र सात दिनों में ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, लेकिन कथा का श्रवण नियम पूर्वक हो, आपके संकल्प को जो सफल बनाने वाला परमात्मा है, उनकी शरणागत होकर भजन करें, अपने जीवन का सुख-दुख, राग-विराग सबकुछ उन्हें सौंपकर सर्वात्म समर्पण भाव से यदि आप भागवत को अपने आपमें उतार लेंगे को मोक्ष की प्राप्ति तय हैं ।
ईश्वर दर्शन को अपनाएं सात सूत्र -
कथा व्यास पं. अनिलकृष्ण महाराज ने बताया कि ईश्वर प्राप्ति के लिए यदि आप 7 सूत्र अपनाकर उसका अमल करें तो निश्चित रूप से आप लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे, इसके लिए पुरुषार्थ, हिम्मत, धैर्य, सावधानी, मधुरवाणी, आहार में शुद्धता और अहर्निश प्रभु चिंतन आवश्यक है, उन्होंने कहा इस कलिकाल में लोग गलत कर्म से लोग दुखी है ।
पार्वती सो गई और शुक ने सुनी कथा -
पं. अनिलकृष्णजी महाराज ने कहा कि एक बार पार्वतीजी ने भोलेनाथ से गुप्त अमर कथा सुनाने की जिद की । शिवजी ने आस-पास देखकर निश्चित होने के लिए कहा कि कोई और तो नहीं सुन रहा है । पार्वती जी ने आस-पास देखकर शिवजी को आश्वस्त कर दिया कि कोई नहीं है । लेकिन वहां शुक जी मौजूद थे । शिवजी पार्वती को कथा सुनाने लगे । कथा सुनते-सुनते पार्वतीजी को नीद आ गई । उनके सोने पर वहां मौजूद शुक जी हुंकार भरने लगे । पार्वती जी की जब नींद टूटी तो उन्होंने शिवजी को नींद आने की बात बतायी । भगवान ने अपनी अंतर्दृष्टि से देखकर शुक जी की उपस्थिति का पता लगा लिया । उन्होंने शुकजी का वध करने के लिए त्रिशुल उठाया । शुकजी भागकर व्यासजी की पत्नी के गर्भ में छिप गए । शिवजी वध के लिए 12 वर्ष तक उनके गर्भ से निकलने का इंतजार करते रहे । बाद में व्यासजी ने शिवजी को शुकजी को क्षमा करने के लिए मना लिया ।इसके साथ राजा परिक्षित को श्राप, सृष्टि निर्माण, शिव पार्वती का पुनः विवाह आदि प्रसंग सुनाए गए ।
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